वर्ष 2024 के अमेरिकी चुनाव की कुछ महत्वपूर्ण घटनाओं के सन्देश
कुछ समय पूर्व ही अमेरिका में राष्ट्रपति पद के चुनाव संपन्न हुए. जो लोग इस चुनाव के परिणामों एवं चुनाव के दौरान होने वाली विभिन्न घटनाओं को लेकर जिज्ञासु थे, उनके लिए यह चुनाव बड़ा दिलचस्प रहा. जिन्हें इस बार के चुनाव में दिलचस्पी रही, उन्होंने चुनाव प्रक्रिया के दौरान हुई विभिन्न घटनाओं का अपने – अपने नजरिये से विश्लेषण किया और उसी के अनुरूप निष्कर्ष भी निकाले.
इस चुनाव के अंतिम परिणाम के प्रति मेरे अंदर भी बड़ा उत्साह था. बहुत से लोगों की भाँति मैं यही चाहता था, कि अमेरिका के अगले राष्ट्रपति "डोनाल्ड" ट्रंप ही बनें. और अंततः वे ही अमेरिका के नए राष्ट्रपति के रूप में चुने गए.
इस चुनाव के दौरान घटित कुछ घटनाओं ने मुझे बड़ा प्रभावित किया. उनमें से जिन घटनाओं ने मुझे प्रभावित किया, उनमें से प्रमुख घटनाओं का मैं यहाँ उनका जिक्र कर रहा हूँ.
कुछ वर्षों पूर्व तक, मैं इस पूर्वाग्रह से ग्रसित था कि “हमारे भारतीय नेताओं एवं यहाँ के सामान्य जन मानस” का चुनावी दृष्टिकोण बड़ा ही सीमित होता है, जबकि विकसित देशों के लोग बड़ा विशाल और उदार दृष्टिकोण रखते हैं. वे अपने हितों के साथ ही, दूसरों के हितों का भी सम्मान करते हैं और उन्हें भी उचित स्थान देने में सहयोग करते हैं.
परन्तु मेरा यह पूर्वाग्रह गलत साबित हुआ. कई घटनाओं ने मुझे यह अहसास दिला दिया, कि मनुष्य चाहे अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, सीरिया, भारत, युगांडा अथवा इस धरती के किसी भी कोने में रहने वाला हो; कुछ विशेष परिस्थितियों में उनके व्यवहार बिलकुल एक जैसे ही होते हैं. उदाहरण के तौर पर अमेरिकी राष्ट्रपति उम्मीदवार ‘‘डोनाल्ड ट्रंप’’ की संभावित जीत से डरे हुए लोग, उन्हें अपने रास्ते से हटाने को इस स्तर तक चले गए, कि वे उनकी हत्या तक कराने की साजिश रच डाले; और चुनावों के प्रचार के दौरान उनपर दो जानलेवा हमले भी करवाए.
भले ही अभी तक यह उजागर न किया गया हो, अथवा यह उजागर न हुआ हो; कि तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार ‘‘डोनाल्ड ट्रंप’’ की हत्या कराने का प्रयास जानबूझकर किया गया या फिर वह किसी व्यक्ति अथवा ग्रुप के द्वारा स्वप्रेरित था. उन पर हुए दो हमलों में से एक हमला तो बड़ा ही घातक था, जिसमें एक व्यक्ति ने तो इतनी सटीकता से गोलियां चलाईं थीं, कि यह मात्र संयोग ही था, कि एक गोली ‘‘डोनाल्ड ट्रंप’’ के सिर में न लगकर उनके कान को चीरती हुई निकल गई. इस हमले में ‘डोनाल्ड ट्रंप’ बाल – बाल ही बचे थे. इस गोली काण्ड पर बहुत से लोगों ने यह संदेह प्रकट किया था, कि यह घटना ‘डीप स्टेट’ द्वारा ‘‘डोनाल्ड ट्रंप’’ की हत्या की एक सुनियोजित साजिश थी.
यह घटना ‘डीप स्टेट’ की सुनियोजित साजिश इसलिए भी लगती है, क्यूंकि जिस दिन ‘‘डोनाल्ड ट्रंप’’ पर वह घातक हमला हुआ था, उस दिन रैली में आये हुए कई लोगों ने उस हमलावर को समय रहते देख लिया था. और वे लोग वहां मौजूद सुरक्षाकर्मियों को चिल्ला – चिल्लाकर उसके बारे में बताने का भी प्रयास कर रहे थे. लोगों के बताने के बावजूद भी, सुरक्षाकर्मियों द्वारा उनकी बातों को तब तक अनसुना किया गया, जब तक कि उस हमलावर ने ‘‘डोनाल्ड ट्रंप’’ को निशाना बनाते हुए कई गोलियां नहीं दाग दीं. शायद वहां पर मौजूद सुरक्षाकर्मी, उस हमलावर को गोलियां चलाये जाने तक का समय जानबूझकर दे रहे थे. सुरक्षा कर्मियों का वैसा आचरण यह प्रदर्शित कर रहा था, कि मानों उन्होंने ‘‘डोनाल्ड ट्रंप’’ की हत्या की सुपारी ली हो.
अमेरिकी राष्ट्रपति पद के सबसे प्रबल दावेदार एवं वहां के पूर्व राष्ट्रपति के साथ हुई ऐसी घटना यह प्रदर्शित करती है कि अमेरिका में भी ऐसे नेताओं की कमी नहीं है, जो अपने चुनावी प्रतिद्वंद्वी को रास्ते से हटाने के लिए अनैतिक से अनैतिक मार्गों को अपनाने से नहीं चूकते.
इस अमेरिकी चुनाव में तो यह स्पष्ट दिखा, कि जब सत्ता में निपट स्वार्थ की राजनीतिक महत्वाकांक्षा वाले लोग एक बार आ जाते हैं, तो वे अपने को पुनः सत्ता में बने रहने के लिए घिनौने से घिनौना काम करने से भी नहीं चूकते.
अमेरिका के अधिकांश राजनेता अपने को दुनिया का सबसे परिपक्व लोकतंत्र बताते नहीं थकते, और वे अपने को दुनिया के ऐसे सभी देशों के खिलाफ होने का नाटक करते हैं, जहाँ या तो लोकतंत्र नहीं है, या यदि है भी, तो वह अमेरिका के जैसा कथित रूप से परिपक्व नहीं है.
अमेरिका के इस बार के राष्ट्रपति पद के चुनावों के दौरान जो दृश्य दिखे, उससे तो यही लगता है कि जो अमेरिका दुनिया में अभिव्यक्ति की आजादी और लोकतंत्र के नाम पर सत्ताएं बदलने और बदलवाने का कार्य करता है, कायदे में आज उसे अपने ही देश के तंत्र में अभी बड़े सुधार करने की आवश्यकता है; जिससे कम से कम वहां के राजनेता तो अपने को सुरक्षित महसूस करें.
‘जो बाईडेन’ का राजनितिक व्यवहार एवं भारतीय नेताओं के व्यवहार में समानताएं : अमेरिका के चुनावों में यह भी देखने को मिला कि अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति ‘‘जो बाईडेन’’, अपने दूसरे कार्यकाल को लेकर बड़े ही आशान्वित थे. उन्हें लगता था कि वर्ष 2024 में होने वाले चुनावों में वे अपनी पार्टी का प्रतिनिधित्व करेंगे, और पुनः राष्ट्रपति पद के दावेदार बनाए जायेंगे. और उनकी जिद के आगे शुरुआत में उनकी पार्टी ने ऐसा किया भी.
कई प्रकार से चुनावी सर्वेक्षणों में यह बात सामने आ रही थी, कि ‘डोनाल्ड ट्रंप’ के सामने ‘जो बाईडेन’ बिलकुल भी नहीं टिकेंगे. यदि ‘जो बाईडेन’ को राष्ट्रपति पद के रूप में पुनः उतारा गया, तो उनकी पार्टी की हार लगभग तय है. ऐसे तथ्य उजागर होने के बावजूद भी ‘जो बाईडेन’ अपने राष्ट्रपति पद की उम्मीदवारी को छोड़ने को तैयार नहीं थे. यह जानते हुए भी, कि यदि वे ही राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार रहे, तो उनकी पार्टी की हार लगभग तय है. बावजूद इसके, ‘जो बाईडेन’ ने अपने व्यक्तिगत स्वार्थ और अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा को अपनी पार्टी के हितों से ऊपर रखा.
उन्हें इस बात से कोई लेना देना नहीं रहा गया, कि यदि उनकी उम्मीदवारी के कारण उनके पार्टी की हार होती है तो उनकी पार्टी के भविष्य का क्या होगा. वे इस बात की तनिक भी परवाह नहीं करने को तैयार थे, कि राष्ट्रपति पद पर उन्हें आसीन करने में उनकी पार्टी का ही प्रमुख योगदान था. फिर भी उन्होंने अपनी पार्टी के हितों एवं उसके भविष्य की परवाह नहीं की. अंत में बड़ी मशक्कत के बाद उनकी पार्टी ने उनके स्थान पर ‘कमला हैरिस’ को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार नामित किया. यह ‘जो बाईडेन’ से जबरदस्ती उनकी उम्मीदवारी छीनने जैसा था.

ठीक इसी प्रकार की स्थिति हमें भारत में भी आज से लगभग एक दशक पूर्व देखने को मिली थी.
वर्ष 2014 के भारतीय लोकसभा चुनावों से पूर्व, भारत की बड़ी पार्टी के एक बड़े ही वरिष्ठ राजनेता ने, बड़ी ही मुश्किल से अपने प्रधानमंत्री पद की दावेदारी छोड़ी थी. उन चुनावों में भारत के आम ‘जन मानस’ द्वारा एक अन्य लोकप्रिय नेता को प्रधानमंत्री पद के लिए दावेदारी प्रस्तुत करने का दबाव बनाया जा रहा था. लेकिन उसी पार्टी के उन वरिष्ठ एवं बुजुर्ग नेता ने ‘जो बाईडेन’ की भांति ही, प्रधानमंत्री पद के लिए अपनी स्वयं की दावेदारी ठोंक रखी थी. वे भी हर हाल में प्रधानमंत्री पद की दावेदारी को, अपनी पार्टी के हितों से ऊपर रख रहे थे. वे अपनी उम्मीदवारी के आगे अपने पार्टी के कार्यकर्ताओं एवं अधिकतर समर्थकों के हितों को भी ताक पर रख रहे थे, और वे यह बर्दाश्त करने को तैयार नहीं थे, कि उन जैसे वरिष्ठ नेता के स्थान पर, उनसे काफी कम उम्र के नेता को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया जाए.
कुल मिलाकर उन वरिष्ठ और बुजुर्ग नेता ने, अपनी पार्टी के राजनीतिक भविष्य, उसकी साख, पार्टी के कार्यकर्ताओं एवं जन अपेक्षाओं को किनारे रखते हुए, उन्होंने अपनी व्यक्तिगत राजनीतिक महत्वाकांक्षा को अधिक महत्व दिया.
ये दोनों राजनेताओं (जो बाईडेन और भारत के वे वरिष्ठ एवं बुजुर्ग नेता) ने अपनी महत्वाकांक्षा की पूर्ति को लेकर इस कदर आमादा थे, कि वे इस ओर ज़रा भी ध्यान देने को तैयार नहीं थे, कि यदि उनकी पार्टी सत्ता में रहती है, तो उनकी साख, एक हारी हुई पार्टी (गैर सत्ताधारी पार्टी) के जीते हुए नेता से बेहतर ही रहनी है; भले ही वे अपनी पार्टी में किसी भी पद पर क्यूँ न रहें.
इस प्रकार के मानवीय व्यवहार ऐसे लोगों पर ही हावी होते हैं, जो समय के साथ अपने विचारों को परिष्कृत करने का प्रयास नहीं करते, और अपनी महत्वाकांक्षा के प्रति अधिक आसक्त रहते हैं; ऐसे इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि वह व्यक्ति किस देश का निवासी है. कुल मिलाकर या मानवीय स्वभाव का एक पहलू ही है.
‘डोनाल्ड ट्रंप’ का दोबारा जीतकर पुनः सत्ता में वापसी करना :
‘डोनाल्ड ट्रंप’ दूसरी बार चुनावों में विजई बनकर आये, यह तो सभी ने देखा. लेकिन उससे भी महत्वपूर्ण और दिलचस्प बात यह है, कि आखिर ‘डोनाल्ड ट्रंप’ इसके पूर्व में हुए चुनाव में हारे क्यूँ थे ?
‘डोनाल्ड ट्रंप’ की हार का जो सबसे बड़ा कारण था – वह यह, कि जब वे राष्ट्रपति पद के पहले कार्यकाल के अंतिम दौर में थे (जिस समय राष्ट्रपति पद के चुनाव होने थे), तो उस दौरान ‘कोरोना महामारी’ ने पूरे विश्व को अपनी चपेट में ले रखा था. और उस समय दुनिया के अधिकांश देश के सामान्य नागरिकों की भांति, अमेरिका के सामान्य नागरिकों में भी इस बात को लेकर निराशा का भाव था, कि उनकी सरकार ने ‘कोरोना’ से ठीक से नहीं निपटा; और उस समय अमेरिका के राष्ट्रपति ‘डोनाल्ड ट्रंप’ ही थे.
उस समय लोगों की अपेक्षाएं सत्ता से बहुत अधिक थीं, लेकिन ‘कोरोना महामारी’ का प्रकोप इतना भीषण था, कि अच्छे से अच्छे देश भी इस महामारी आगे अपने को विवश पा रहे थे.
कायदे में यह दोष ‘डोनाल्ड ट्रंप’ का तो कतई नहीं था. लेकिन इसे लोकतंत्र की बड़ी कमी ही कहेंगे, कि इसमें अक्सर मतदाता, अपरिपक्वता का ही परिचय देते हैं; और वे अपने क्षणिक लाभ – हानि के आधार पर अपना वोट डालते हैं. जो घटनाएं चुनावों के समय, अथवा उसके ठीक पहले होती हैं, वह लोगों के मन में ताजा रहती हैं और चुनावों में उन घटनाओं से प्रभावित होकर भी लोग वोटिंग भी करते हैं.
कायदे में उस समय लोगों को यह विचार करना चाहिए था, कि ‘डोनाल्ड ट्रंप’ के स्थान पर यदि ‘जो बाईडेन’ अथवा ‘कमला हैरिस’ या फिर कोई और भी उनके देश की राष्ट्रपति होता, तो क्या वह व्यक्ति उस महामारी से ‘डोनाल्ड ट्रंप’ की तुलना में बेहतर ढंग से निपट पाता ?
फिर वही हुआ जिसकी आशंका थी. ‘डोनाल्ड ट्रंप’ को कोरोना महामारी के दौरान (हालांकि उस समय महामारी का प्रकोप काफी कम हो चुका था) हुए चुनाव में हार का सामना करना पड़ा. ऐसे में मात्र एक ‘प्राकृतिक परिस्थिति’ ने अमेरिका को अगले चार वर्ष के लिए एक गड्ढे में ढकेल दिया.
खैर चार वर्ष का वनवास काटने के बाद, अमेरिका के लोगों ने बड़े ही जुनून से वोटिंग करके अमेरिका की सत्ता को पुनः ‘डोनाल्ड ट्रंप’ के हाथों में सौंपा.
कोरोना महामारी के दौरान हुए चुनावों में ‘डोनाल्ड ट्रंप’ की हार की घटना यह स्पष्ट करती है, कि लोकतंत्र में अक्सर एक बड़ी जनसंख्या, अपने क्षणिक नफे – नुकसान को अधिक महत्व देती है.
वर्ष 2020 के चुनावों में ‘डोनाल्ड ट्रंप’ की हार, उनके राष्ट्रपति पद पर रहने की उनकी अयोग्यता का परिणाम नहीं था; बल्कि यह मात्र एक क्षणिक परिस्थिति (कोरोना महामारी) से उत्पन्न हुए माहौल का एक परिणाम था.
मीडिया और ‘डोनाल्ड ट्रंप’ :
अपने पहले राष्ट्रपति पद के कार्यकाल में, ‘डोनाल्ड ट्रंप’ का अमेरिका के हितों को सर्वोपरि रखने तथा अमेरिका एवं वैश्विक समाज के हितों के प्रति व्यापक रिफार्म करने का रैवैया बड़ा ही स्पष्ट एवं बेबाक रहा था. वे बिना किसी ‘लाग – लपेट’ के कार्य भी करते थे और अपने विचारों को अभिव्यक्त करने में भी कोई संकोच नहीं किया करते थे.
अपने पहले कार्यकाल में ही उन्होंने अमेरिकी एवं वैश्विक समुदाय के हितों के लिए बनी हुई कुछ अतिमहत्वपूर्ण एवं संवेदनशील संस्थाओं के क्रिया - कलापों के बारे में भी अपनी बेबाक राय रखी; और उन्होंने ऐसी संस्थाओं की खुले आम आलोचना करने में भी कोई कोर कसर नहीं छोड़ी.
यह किसी से छिपा नहीं है, कि अधिकतर वैश्विक संस्थाओं में महत्वपूर्ण एवं संवेदनशील पदों पर बैठे अधिकांश लोग, अपनी संस्था के उद्देश्यों / लक्ष्यों के प्रति उदासीन होकर कार्य करते हैं; भले ही उसका कारण कोई भी हो. वे अक्सर अपने व्यक्तिगत स्वार्थ को अपनी संस्था के उद्देश्यों से ऊपर रखते हैं. यही कारण है कि ऐसी बहुत सी संस्थाओं का अस्तित्व दिखावे मात्र तक ही सीमित रहता है और वे अपने लक्षित समाज की अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतरती हैं.
‘डोनाल्ड ट्रंप’ स्वभाव से ही लक्ष्य उन्मुखी (goal oriented) रहे हैं, और उनका स्वभाव निश्चल प्रकृति का है. जब वे राष्ट्रपति के रूप में पहली बार सत्ता में आये, तो उन्होंने ऐसी सभी संस्थाओं के क्रिया कलापों को नजदीक से देखा जो आम जनमानस के जीवन को बेहतर एवं सुरक्षित बनाने के लक्ष्य को लेकर बनाई गईं थीं.
चूँकि इन संस्थाओं के खर्चों के लिए हर वर्ष बहुत बड़ी मात्रा में धन खर्च होता है, अतः ऐसी संस्थाओं से यह स्वाभाविक अपेक्षा की जाती है, कि वे उनपर खर्च की जाने वाली धनराशि के अनुरूप अपेक्षित परिणाम भी दें. परन्तु ऐसा होता हुआ नहीं दिख रहा था.
‘डोनाल्ड ट्रंप’ को ऐसी संस्थाओं के कार्य कलाप मात्र खानापूर्ती तक सीमित दिखे, और उन्होंने उन संस्थाओं को आईना दिखाने में कोई चूक भी नहीं की. उन्होंने उन संस्थाओं से अपने वास्तविक लक्ष्यों की पूर्ति करने की दिशा में कार्य करने की अपेक्षा की, परन्तु जब उन्हें पता चला कि इन संस्थाओं में कई लोग निपट स्वार्थी तत्व, पद, पैसे और पॉवर के लिए वहां जमें हैं, जिनके “आका लोग” बहुत ही शक्तिशाली (powerful) लोग हैं, जिससे ‘डोनाल्ड ट्रंप’ की बातों का उनपर कोई फर्क बही पड़ता; तो फिर जब ‘डोनाल्ड ट्रंप’ ने इन संस्थाओं की खुले आम कलई खोलनी शुरू की. ऐसे में उन संस्थाओं के निपट स्वार्थी एवं ताकतवर लोग, अपनी – अपनी ताकत के साथ ‘डोनाल्ड ट्रंप’ के पीछे पड़ गए. इन लोगों ने ‘डोनाल्ड ट्रंप’ के विरोध हेतु हर सम्भव संसाधनों/हथियारों का इस्तेमाल किया जिसमें ‘मीडिया’ बड़ी प्रमुख भूमिका में था. ऐसा करके तत्कालीन राष्ट्रपति ‘डोनाल्ड ट्रंप’ के विरुद्ध पूरे चार वर्ष तक अभियान चलाया गया, जिसमें उनके लगभग सभी अभियान फेल ही रहे थे; परन्तु ‘कोरोना महामारी’ ने उनके अभियान में जान डाल दी, और इस महामारी को हथियार बनाकर मीडिया ने अमेरिका की अच्छी खासी जनता को गुमराह करने में अंततः सफलता हासिल ही कर ली.
वर्ष 2020 के चुनावों में ‘डोनाल्ड ट्रंप’ की हार के बाद जब सत्ता परिवर्तन हुआ, और जब अमेरिका के लोगों ने ‘जो बाईडेन’ के चार वर्षों के कार्यकाल को देखा, और उसकी तुलना जब उन्होंने ‘डोनाल्ड ट्रंप’ के कार्यकाल से की, तो यह स्पष्ट हो गया, कि अगले राष्ट्रपति ‘डोनाल्ड ट्रंप’ ही चुने जायेंगे. ‘डीप स्टेट’ के लोगों का यह पता चल चुका था कि अमेरिका के अगला राष्ट्रपति ‘डोनाल्ड ट्रंप’ ही होने वाले हैं; इसलिए फिर उन्हें एक ही अंतिम और अपेक्षाकृत सरल विकल्प दिखा, कि वे ‘डोनाल्ड ट्रंप’ को रास्ते से ही हटा दें.
‘डोनाल्ड ट्रंप’ के रहते अमेरिका में दूसरी पार्टी का उम्मीदवार राष्ट्रपति पद के लिए चुना नहीं जा सकता था. शायद इसीलिए उन्होंने ‘ट्रंप’ को रास्ते से हटाने के लिए शूटर की सहायता ली होगी.
अमेरिका की मेन स्ट्रीम मीडिया ने, 2024 के चुनावों के अंतिम क्षणों तक ‘डोनाल्ड ट्रंप’ के विरोध में दुष्प्रचार जारी रखा और उसने ‘कमला हैरिस’ को राष्ट्रपति पद के सबसे प्रबल दावेदार के रूप में प्रस्तुत करता रहा. चुनावों के परिणामों के आने से ठीक पहले तक, अमेरिका की सभी ‘मेन स्ट्रीम मीडिया’ ने ‘कमला हैरिस’ और ‘डोनाल्ड ट्रंप’ के बीच कांटे की टक्कर बताता रहा; जबकि सच्चाई तो यह थी, कि चाहे वह ‘जो बाईडेन’ होते या फिर उनके स्थान पर आई ‘कमला हैरिस’, दोनों ही उम्मीदवार, ‘डोनाल्ड ट्रंप’ के मुकाबले में कभी थे ही नहीं.
लेकिन स्वार्थी लोगों ने अंतिम समय तक ‘डोनाल्ड ट्रंप’ जो हारने के लिए तन मन धन से संघर्ष किया. वहां की ‘मेन स्ट्रीम मीडिया’ ने यहाँ तक भी दुष्प्रचार किया, कि भारतीय अमेरिकियों की 70% से अधिक जनसंख्या ‘कमला हैरिस’ को राष्ट्रपति के रूप में देखना चाहती है.
अमेरिकी लोकतंत्र और व्यवसायी :
इस चुनाव में हमने यह भी बड़ा स्पष्ट देखा, कि राष्ट्रपति पद का सबसे प्रबल दावेदार, अपने देश एवं विश्व के सबसे बड़े व्यवसायी एवं धनी व्यक्ति “एलन मस्क” का खुले आम सहयोग लेकर चुनाव प्रचार करता है. ऐसे व्यवसायी का खुले आम समर्थन और साथ लेकर वह उम्मीदवार बड़े प्रचंड बहुमत से चुनाव भी जीतता है.
वहीँ इस बात की कल्पना हम वर्तमान भारत के लोकतंत्र में कर ही नहीं सकते, कि भारत को कोई बड़ा व अमीर व्यवसायी, भारत के किसी प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार का चुनाव प्रचार करे. क्योंकि भारत की एक बड़ी जनसंख्या को यह कहकर गुमराह करने की कोशिश की जाती है कि “व्यवसायी जनता के शोषक है”. जो लोग भारतीय व्यवसायियों को भारत में और विश्व में किसी ‘खलनायक’ के रूप में प्रदर्शित करके लोगों में भ्रम उत्पन्न करने का कार्य करते हैं, उनमें से सभी व्यवसायियों के चंदे के दम पर ही अपने चुनाव कार्यक्रमों को करते हैं.
अतः भारत की वर्तमान राजनीति को अभी इस स्तर तक पहुँचाना शेष है, जहाँ व्यवसायियों को समाज के विकास का अत्यंत महत्वपूर्ण अंग माना जाया और उनकी राजनीतिक स्वीकार्यता हो, जैसा कि अमेरिका में होता है.
-बी०पी०सिंह
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